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भोपाल पुलिस में तबादला नीति का हाल बेहाल: अफसरों की मनमानी, अंगदों का कब्ज़ा, DGP के आदेश हवा में !

सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट

भोपाल। मध्य प्रदेश के मुखिया और डीजीपी द्वारा पुलिसकर्मियों के नियमित तबादले को लेकर जारी निर्देशों को राजधानी के अफसर और बाबू ठेंगा दिखा रहे हैं। हाल ही में नगरीय सीमा में तीन दिन पहले हुए थोकबंद तबादलों में भारी गड़बड़ियां सामने आई हैं। क्राइम ब्रांच और थानों में पदस्थ ऐसे पुलिसकर्मियों को बचा लिया गया है जो वर्षों से एक ही जगह जमे हुए हैं। डीजीपी के सख्त आदेश के बावजूद राजधानी के थानों और शाखाओं में “अंगदों” को हटाने के बजाय बाकी कर्मचारियों को तबादले की सूची में डाल दिया गया।

सूत्रों के अनुसार, इन तबादलों में जानबूझकर गड़बड़ी की गई। PHQ के स्पष्ट निर्देश हैं कि किसी भी पुलिसकर्मी की एक जगह पर अधिकतम पोस्टिंग 3 साल की होनी चाहिए, लेकिन राजधानी के कई थानों में 8 से 15 साल से एक ही स्थान पर पदस्थ कर्मचारी खुलेआम तबादला नीति की धज्जियां उड़ा रहे हैं। थाना बजरिया में मनोज शिवड़े 15 साल, छन्नूलाल चौहान 9 साल और दीपक कटियार 8 साल से पदस्थ हैं। थाना बागसेवनिया में राकेश भारद्वाज और मुकेश स्थापक क्रमश: 8 और 9 साल से वहीं हैं, जबकि उपेन्द्र सिंह तीसरी पोस्टिंग में हैं। थाना मिसरोद में शैलेन्द्र भदौरिया करीब 15 साल से जमे हुए हैं।

थाना हबीबगंज में धीरेन्द्र सिंह और सुदर्शन मिश्रा 12-12 साल से पदस्थ हैं और AJK-हबीबगंज के बीच ऊपर-नीचे होते रहते हैं। थाना टीटी नगर में मनोज सिंह का तो पूरा सेवाकाल इसी थाने में बीतता दिखता है। चुनाभट्टी थाने में एक ASI 12 साल से तैनात हैं और कार्यवाहक प्रधान आरक्षक राजेश सेन थाने से लेकर ACP कार्यालय तक सीधा संबंध रखते हैं, इन्हें भी नहीं बदला गया। एमपी नगर थाने से सुनील और जितेन्द्र दीवार फांद कर क्राइम ब्रांच चले गए और फिर एमपी नगर लौट आए।

थाना कोलार में मनोज शर्मा सिपाही से ASI तक बन चुके हैं लेकिन तैनाती एक ही स्थान पर रही, वहीं हवलदार राजकुमार राजपूत दूसरी पोस्टिंग के बावजूद नहीं बदले गए। शाहपुरा थाना में नागेन्द्र सिंह की यह तीसरी पोस्टिंग है। थाना पिपलानी में केपी सिंह, मिनेश मिश्रा और विजय चौधरी आठ साल से अधिक समय से और दो-दो, तीन-तीन पोस्टिंग झेल चुके हैं।

अशोका गार्डन थाने की हालत सबसे अलग है, जहां ASI जयबीर सैगर पर दो महीने पहले हमला हुआ था लेकिन उन्हें फिर वहीं भेज दिया गया। ASI इरफान खान पहले 5 साल और अब 4 साल से वहीं तैनात हैं यानी 9 साल की पोस्टिंग। ASI हरवीर भी लगातार 5 साल से अशोका गार्डन में ही हैं।

MP नगर थाना में SI जितेन्द्र मिश्रा करीब 10 साल से पदस्थ हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या कुछ पुलिसकर्मियों को तबादला नीति से छूट मिली हुई है? ,आलोक तिवारी, छत्रपाल सिंह और अविनाश राय जैसे नाम ऐसे हैं जिन पर गंभीर आरोप लगे, फिर भी इन्हें मनमाफिक थानों में पोस्टिंग मिलती रही है।

प्रधान आरक्षक आलोक तिवारी पर महिला से पैसे लेने के आरोप लगे थे, जिसके बाद उन्हें लाइन भेजा गया, लेकिन दो दिन में ही फिर से अरेरा हिल्स, और फिर कोहेफिजा थाने में पोस्टिंग मिल गई। बताया जाता है कि कोहेफिजा थाने में तैनात अधिकारी उनके रिश्तेदार हैं। छत्रपाल सिंह को कमला नगर और टीटी नगर के अलावा कहीं नौकरी करते नहीं देखा गया क्योंकि उनके करीबी नेताओं और मंत्रियों से अच्छे संबंध हैं।

अविनाश राय, जो कि शराब के नशे में अफसरों पर टिप्पणी करने के मामले में विवादों में रहे, आज भी सुरक्षित हैं।

क्राइम ब्रांच में फेरबदल की आशा लगाए पुलिसकर्मियों को तब झटका लगा जब उनके अधिकारियों ने चहेतों को बचा लिया। दरअसल, निशातपुरा क्षेत्र में एक पिस्तौलधारी को पकड़ने के बाद जबरन वसूली का मामला सामने आया था। इसमें कार्रवाई के तौर पर ASI जुबैर खान और एक आरक्षक को लाइन हाजिर किया गया, जबकि इस पूरे मामले के पीछे जो चेहरे थे, वो आज भी क्राइम ब्रांच में जमे हुए हैं।

क्राइम ब्रांच से साइबर और फिर से क्राइम ब्रांच में लाने की अदला-बदली दिखाती है कि किस तरह डीजीपी के आदेश का सिर्फ दिखावा किया गया। देर रात रवानगी के आदेश के बाद जोड़तोड़ कर कुछ को रुकवा दिया गया और कुछ को वापसी का आश्वासन दिया गया।

सूत्र बताते हैं कि राजधानी भोपाल में थानों का रिकार्ड उठाया जाए तो हर थाने में दो-चार ऐसे अंगद जरूर मिलेंगे जो 8 से 12 साल से वहीं जमे हुए हैं, जिनकी दूसरी-तीसरी पोस्टिंग है, जिनपर गंभीर आरोप हैं, फिर भी अधिकारी इन्हें बचा रहे हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है – क्या राजधानी में डीजीपी के आदेश की कोई कीमत बची है? क्या जोन डीसीपी और क्राइम ब्रांच के अधिकारियों के सामने डीजीपी भी छोटे पड़ गए हैं? क्या तबादला नीति सिर्फ कमजोर पुलिसकर्मियों पर लागू होती है?

जरूरत है पारदर्शी और निष्पक्ष समीक्षा की। क्योंकि इससे न केवल पुलिसकर्मियों का मनोबल तय होगा, बल्कि जनता का सिस्टम पर भरोसा भी कायम रह पाएगा।

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