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अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक–सांस्कृतिक महोत्सव में शामिल होंगे डॉ. मो. जमील हसन अंसारी, मिथिला की शैक्षणिक प्रतिष्ठा को मिलेगा नया आयाम

कोलकाता/दरभंगा। भोजपुरी साहित्य विकास मंच व भारतीय भाषा शोध संस्थान, कोलकाता द्वारा आयोजित 12वाँ एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक–सांस्कृतिक महोत्सव एवं सम्मान समारोह 2025 तथा “प्रगति शोध संगोष्ठी” के लिए ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के इतिहास विभाग के युवा शिक्षाविद् डॉ. मो. जमील हसन अंसारी को विशेष आमंत्रण प्राप्त हुआ है। यह प्रतिष्ठित कार्यक्रम 26 दिसंबर 2025 को रिसड़ा स्थित रवींद्र भवन, कोलकाता में आयोजित होगा।

आमंत्रण स्वीकार करते हुए डॉ. जमील ने कहा कि यह अवसर उनके लिए व्यक्तिगत उपलब्धि होने के साथ-साथ मिथिला की समृद्ध शैक्षणिक परंपरा को राष्ट्रीय–अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने वाला महत्वपूर्ण क्षण है। उन्होंने इसे साहित्य, संस्कृति और इतिहास जैसे विषयों की अंतःविषयक समझ को मजबूत करने का एक मूल्यवान अवसर बताया।

डॉ. जमील ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में शामिल होने से शोधार्थियों व शिक्षाविदों को विभिन्न देशों और भाषाई–सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आए विद्वानों, इतिहासकारों और साहित्यकारों से सीधे संवाद का अवसर मिलता है, जो शोध-दृष्टि को व्यापक बनाता है। उनके अनुसार इतिहास एक ऐसा विषय है जो निरंतर नए प्रश्नों और नए साक्ष्यों की खोज करता है, इसलिए वैश्विक विमर्श इतिहास-लेखन की पद्धतियों, तुलनात्मक अध्ययन, क्षेत्रीय इतिहास और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की समझ को और समृद्ध करता है।

उन्होंने कहा कि “सुरक्षित रास्तों पर इतिहास नहीं लिखा जाता”—यह विचार केवल प्रेरक वाक्य नहीं, बल्कि मानव सभ्यता और उसके संघर्षों की गहरी सच्चाई है। इतिहास वही रचते हैं जो जोखिम और अनिश्चितताओं के बीच आगे बढ़ने का साहस रखते हैं।

डॉ. जमील के अनुसार इस सम्मलेन में भागीदारी से न सिर्फ उन्हें, बल्कि मिथिला के युवा शोधार्थियों, विद्यार्थियों और इतिहास–चिंतकों को भी नए अवसर और प्रेरणा मिलेगी। एक शिक्षाविद् के रूप में उनका मानना है कि शिक्षण के साथ-साथ युवाओं के लिए नए संवाद और नए मंच उपलब्ध कराना भी उनकी जिम्मेदारी है। कार्यक्रम के दौरान होने वाले शोध-पत्र वाचन, सांस्कृतिक विमर्श और विद्वानों के बीच विचार-संवाद से क्षेत्रीय इतिहासों को राष्ट्रीय व वैश्विक संदर्भों से जोड़ने में मदद मिलेगी।

मिथिला, जिसकी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भाषिक विरासत सदियों से विद्वानों का आकर्षण रही है, इस आयोजन के माध्यम से एक बार फिर अपनी शैक्षणिक उपस्थिति को सशक्त रूप में दर्ज कराएगा। आयोजन समिति के प्रति आभार जताते हुए डॉ. जमील ने उम्मीद जताई कि यह महोत्सव भारत की बहुभाषिक समृद्धि, ऐतिहासिक चेतना और शैक्षणिक शोध परंपरा को नई दिशा प्रदान करेगा।

शैक्षणिक जगत के अनुसार यह आमंत्रण मिथिला क्षेत्र के लिए गौरवपूर्ण क्षण है, जो युवा शोधार्थियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर के नए आयाम और शोध-अनुभव प्रदान करेगा तथा इतिहास-अध्ययन को और अधिक सशक्त, संवेदनशील और शोधपरक बनाएगा।

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