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भोपाल: शिक्षा मंडल में पुताई घोटाला उजागर, उप यंत्री विनोद मंडराई पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप

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संपादक-इकबाल खान

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भोपाल, मध्य प्रदेश की राजधानी एक बार फिर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में घिर गई है। इस बार मामला माध्यमिक शिक्षा मंडल से जुड़ा हुआ है, जहां लाखों रुपये का पुताई कार्य सिर्फ कागज़ों में दिखाकर भुगतान कर दिया गया, जबकि ज़मीनी स्तर पर कोई काम हुआ ही नहीं। यह पूरा प्रकरण विभागीय कार्यप्रणाली, जवाबदेही और पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

इस घोटाले में मुख्य भूमिका उप यंत्री विनोद मंडराई की मानी जा रही है, जिन्होंने कथित रूप से एक ठेकेदार के नाम पर भुगतान करवा दिया। एकल सत्य समाचार पत्र के द्वारा लेटर पैड पर दिए गए फोन नंबर पर ठेकेदार से चर्चा करने का प्रयास किया गया ताकि वास्तविक सत्यता क्या है लेकिन ठेकेदार कलेक्टर पेपर दिए गए फोन नंबर पर किसी अन्य व्यक्ति द्वारा फोन उठाकर बताया गया कि वह किसी असलम ठेकेदार को नहीं जानते हैं शिकायतकर्ता मुईद खान के संदेश से मामला तब और गंभीर हो गया जब यह सामने आया कि विभाग ने एशियन पेंट जैसी प्रमाणित कंपनी से कोटेशन लिया, परंतु कार्य व बिल स्थानीय ठेकेदार के नाम दर्शाया गया। सरकारी नियमों के अनुसार, केवल अधिकृत निर्माता ही ऐसे कार्यों के लिए पात्र होते हैं। यहां न तो कोई टेंडर निकाला गया, न ही किसी प्रकार की सार्वजनिक सूचना दी गई। असलम के लेटरहेड पर न केवल पुताई सामग्री का विवरण था, बल्कि मजदूरों—पेंटर, सहायक पेंटर, सफाईकर्मी और हेल्पर के नाम—तक जोड़कर भुगतान दर्शाया गया है, जिससे फर्जीवाड़ा और भी स्पष्ट होता है। मध्य प्रदेश भंडार क्रय तथा सेवा उपार्जन नियम 2015 कभी उल्लंघन किया गया है।

विनोद मंडराई पहले भी कई संदिग्ध निर्माण कार्यों में संलिप्त रहे हैं। कामों को लेकर भ्रष्टाचार की आशंका व्यक्त की जा चुकी है। इसके बावजूद उन्हें विभाग में अहम जिम्मेदारियाँ मिलती रही हैं। अब्दुल मुईद खान का आरोप है कि मंडराई अपने पद का दुरुपयोग कर अब शाहपुरा A सेक्टर में एक आलीशान मकान का मालिक बन चुके हैं। शिकायतकर्ता का कहना है कि इन संपत्तियों की स्थिति और सुविधाएं देख कर साफ ज़ाहिर होता है कि यह संपत्ति उनकी वैध आय से कहीं अधिक है। जिसकी सही से जांच हो जाए तो न जाने और कितनी संपत्ति का खुलासा हो सकता है।

सबसे गंभीर बात यह है कि मंडराई आज भी पदस्थ हैं और खुद ही अपनी जांच रिपोर्ट तैयार कर आर्थिक अपराध शाखा (EOW) को भेज रहे हैं। यह स्थिति न केवल जांच की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि नियमों और प्रक्रियाओं की पूरी तरह अनदेखी की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 और मध्यप्रदेश सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 के तहत आरोपी अधिकारी को जांच के दौरान पद से हटाना अनिवार्य है, ताकि वह जांच को प्रभावित न कर सके।

यह मामला केवल एक आर्थिक घोटाले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शासन की कार्यप्रणाली, जवाबदेही और पारदर्शिता की जड़ें हिलाने वाला मामला बन गया है। यदि समय रहते निष्पक्ष जांच नहीं हुई और दोषियों पर कठोर कार्रवाई नहीं की गई, तो यह प्रकरण जनता के विश्वास को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है और भविष्य में भ्रष्टाचार को और अधिक बढ़ावा देगा।

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